माँ ब्रह्मचारिणी का 'ब्रह्मचारिणी' शब्द 'ब्रह्म' (तपस्या) और 'चारिणी' (आचरण करने वाली) से मिलकर बना है, अर्थात् तप का आचरण करने वाली देवी। उनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएँ हाथ में कमंडलु होता है, जो उनकी साधना और त्यागमयी जीवनशैली को दर्शाता है।
पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। उन्होंने हजारों वर्षों तक फल-फूल, शाक और बिल्व पत्रों पर निर्वाह किया, फिर निर्जल और निराहार रहकर तपस्या की। उनकी इस कठोर साधना के कारण उन्हें 'ब्रह्मचारिणी' नाम से जाना गया।
माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना से भक्तों में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उनका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता। माँ की कृपा से सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है।
1. स्वयं और पूजा स्थल को शुद्ध करें। 2. माँ ब्रह्मचारिणी की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें। 3. फूल, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। 4. माँ के ध्यान मंत्र और स्तोत्रों का जाप करें। 5. माँ की आरती उतारें और प्रसाद वितरण करें।
माँ ब्रह्मचारिणी की कथा हमें सिखाती है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी हमें अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिए। उनकी कृपा से हमें अटूट संकल्प, धैर्य और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है, जिससे हम अपने जीवन में सफलता और सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं।