हिंदू विवाह नियमों जैसे होने चाहिए मुस्लिम निकाह के नियम: AIMWPLB President

 

New Delhi: ट्रिपल तलाक पर आज का दिन एतिहासिक साबित हो सकता है। पिछले कुछ महीनों से ट्रिपल तलाक के मामले जिस तरह से सामने आए हैं ये बेहद चिंता का विषय बन गया है जिसके फलस्वरुप आज मुसलमानों में sc तमाम ‘तीन तलाक’, ‘निकाह हलाला’ और बहुपत्नी प्रथा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शुरू करेगा।

 

तीन तलाक के मामले में AIMPLB ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की President शैस्टा अंबर का कहना है कि जिस तरह हिंदू विवाह के अधिनियम, कानून काम करते हैं उसी आधार पर मुस्लिम निकाह में भी वैसे ही अधिनियम होने चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ सात याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगी. इनमें पांच याचिकायें मुस्लिम महिलाओं ने दायर की हैं जिनमें मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक की प्रथा को चुनौती देते हुये इसे असंवैधानिक बताया गया है. संविधान पीठ के सदस्यों में सिख, ईसाई, पारसी, हिन्दू और मुस्लिम सहित विभिन्न धार्मिक समुदाय से हैं.इस पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर शामिल हैं.

संविधान पीठ मुस्लिम समुदाय में तीन तलाक, बहुविवाह ‘निकाह हलाला’ जैसी प्रथाओं का संवैधानिक आधार पर विश्लेषण करेगी. कोर्ट तीन तलाक के सभी पहलुओं पर विचार करेगी. अदालत ने जोर देकर कहा कि यह मसला बहुत गंभीर है और इसे टाला नहीं जा सकता. कोर्ट ने ये भी साफ किया है कि इस मामले में यूनिफार्म सिविल कोड पर चर्चा नहीं होगी.

सुनवाई के दौरान तीन तलाक को लेकर केंद्र सरकार ने कोर्ट के सामने कुछ सवाल रखे :
1. धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत तीन तलाक, हलाला और बहु-विवाह की इजाजत संविधान के तहत दी जा सकती है या नहीं ?
2. समानता का अधिकार और गरिमा के साथ जीने का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में प्राथमिकता किसको दी जाए?
3. पर्सनल लॉ को संविधान के अनुछेद 13 के तहत कानून माना जाएगा या नहीं?
4. क्या तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु-विवाह उन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत सही है, जिस पर भारत ने भी दस्तखत किये हैं?

इससे पहले, AIMPLB ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की दलील
– ट्रिपल तलाक को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन बताने वाले केंद्र सरकार का रुख बेकार की दलील है.
– पर्सनल लॉ को मूल अधिकार के कसौटी पर चुनौती नहीं दी जा सकती.
– ट्रिपल तलाक, निकाह हलाला जैसे मुद्दे पर कोर्ट अगर सुनवाई करता है तो ये जूडिशियल लेजिस्लेशन की तरह होगा.
– केंद्र सरकार ने इस मामले में जो स्टैंड लिया है कि इन मामलों को दोबारा देखा जाना चाहिए ये बेकार का स्टैंड है.

ट्रिपल तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने लिखित जवाब दाखिल कर कहा है कि
– ट्रिपल तलाक के खिलाफ दाखिल याचिका सुनवाई योग्य नहीं है.
– मुस्लिम पर्सनल लॉ को संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत प्रोटेक्शन है उसे मूल अधिकार के कसौटी पर नहीं आंका जा सकता.
-कोर्ट पर्सनल लॉ को दोबारा रिव्यू नहीं कर सकती उसे नहीं बदला जा ससकता. कोर्ट पर्सनल लॉ में दखल नहीं दे सकती.
– मुस्लिम पर्सनल लॉ में एक बार में ट्रिपल तलाक, हलाला और बहु विवाह इस्लमिक जो इस्लामिक रिलिजन का महत्वपूर्ण पार्ट है और वह मुस्लिम पर्सनल लॉ के चारों स्कूलों द्वारा परिभाषित है.
– मुस्लिम पर्सनल लॉ संविधान के अनुच्छेद-25, 26 व 29 में प्रोटेक्टेड है और क्या इसका व्याख्या या रिव्यू हो सकता है ?
– संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का जहां तक सवाल है तो वह एग्जेक्युटिव के खिलाफ लोगों को अधिकार मिला हुआ है लेकिन इसे प्राइवेट पार्टी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं हो सकता.
– किसी व्यक्तिगत शख्स के खिलाफ इसे लागू नहीं कराया जा सकता. संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत जनहित याचिका का इस्तेमाल प्राइवेट शख्स के खिलाफ इस्तेमाल के लिए नहीं हो सकता क्योंकि ये मामला पर्सनल है.
– सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कई मामलों में ये व्यवस्था दे रखी है कि किसी व्यक्ति विशेष या आइडेंटिकल केस जूडिशियल रिव्यू नहीं हो सकता.
-सवाल था कि क्या बहुविवाह संविधान के अनुच्छेद 14 व 15 के खिलाफ है क्या एक तरफा तलाक लिया जाना समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है. एक से ज्यदा पत्नी रखा जा सकता है क्या ये क्रुअल्टी नहीं है. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये मामला विधायिका का है. कोर्ट इस मालमे में विधान नहीं बना सकती.
– बोर्ड की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि संवैधानिक स्कीम के तहत जूडिशयिरी का महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन धर्म और धार्मिक कार्यक्रम को कोर्ट तय नहीं कर सकता.
– अगर किसी धार्मिक मसले पर विभेद होगा तो धार्मिक ग्रंथ व किताबों का सहारा लिया जाएगा्. धार्मिक सवाल पर कोर्ट के पास अपना विचार रखने का स्कोप नहीं है.
-इस्माम में शादी को सिविल कॉन्ट्रैक्ट माना जाता है. शरियत शादी को जीवन भर का साथ मानता है.
– इसे टूटने से बचान के तमाम प्रयास किए जाते हैं. लेकिन इसे अखंडनीय नहीं माना जाता और जबरन रहने के लिए मजबूर नहीं किया जाता.
-शादी के वक्त ही तलाक आदि के प्रावधान के बारे में पता होता है और शर्त मानने या न मानने के लिए पार्टी स्वतंत्र होता है.
– एक बार में तीन तलाक का जहां तक सवाल है तो ये अवांछनीय जरूर है लेकिन तीन तलाक से शादी खत्म हो जाती है. तीन तलाक कहने के बाद पत्नी का दर्जा खत्म हो जाता है.
-मुस्लिम पर्सनल लॉ को संविधान के अनुच्छेद25 व 26 में प्रोटेक्ट किया गया है. – पर्सनल लॉ कल्चरल मुद्दा है और इसे प्रोटेक्शन दिया गया है. कोर्ट पर्सनल लॉ में दखल नहीं दे सकती.
– जहां भी दुनिया में पर्सनल लॉ में बदलाव हुआ है तो वह भारतीय समाजिक व सास्कृतिक परिस्थितियों से अलग है. भारतीय संदर्भ में उसे देखना होगा. अगर उसमें बदलाव हुआ तो इस्लाम धर्म मानने वाले लोगों के साथ न्याय नहीं होगा.

लॉ बोर्ड के सवाल
इसके तहत कई सवाल मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से कोर्ट के सामने रखे गए:
– क्या ये ट्रिपल तलाक आदि के खिलाफ दाखिल याचिका विचार योग्य है ?
– क्या पर्सनल लॉ को मूल अधिकार की कसौटी पर टेस्ट हो सकता है.
– क्या कोर्ट धर्म और धार्मिक लेख की व्याख्या कर सकता है ?

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